संविदा भर्तियों में आरक्षण लागू करने, बैकलॉग पद भरने और पदोन्नति में आरक्षण बहाल करने की मांग
देहरादून 7 नवंबर ।भारतीय दलित साहित्य अकादमी उत्तराखंड ने राज्य गठन के 26 वर्ष पूरे होने पर प्रदेश में दलित एवं शिल्पकार समाज की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति को लेकर सवाल उठाए हैं। अकादमी के प्रदेश अध्यक्ष प्रो. जयपाल सिंह ने कहा कि उत्तराखंड ने विकास के कई दावे किए हैं, लेकिन विकास की वास्तविक कसौटी यह है कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े वंचित और शिल्पकार वर्ग को कितने अवसर और अधिकार मिले हैं।
शनिवार, 7 नवंबर को देहरादून में आयोजित प्रेस वार्ता में प्रो. जयपाल सिंह और प्रदेश महासचिव सीपी सिंह ने मुख्यमंत्री एवं नेता प्रतिपक्ष को भेजे गए 10 सूत्रीय संवैधानिक मांग-पत्र की जानकारी दी। प्रो. जयपाल सिंह ने कहा कि प्रदेश में अनुसूचित जाति एवं जनजाति की आबादी लगभग 21.55 प्रतिशत है और कुल आबादी का करीब एक चौथाई हिस्सा वंचित वर्गों से जुड़ा है। इसके बावजूद यह समाज आज भी भूमि अधिकार, शिक्षा, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और सम्मान के लिए संघर्ष कर रहा है।
उन्होंने कहा कि समाज कल्याण की योजनाओं के बावजूद दलित समाज गरीबी और उत्पीड़न से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाया है। सरकारी विद्यालयों को बंद किए जाने से गरीब बच्चों की शिक्षा प्रभावित हो रही है, जबकि संविदा और आउटसोर्सिंग के माध्यम से भर्तियों में संवैधानिक आरक्षण की अनदेखी की जा रही है।
प्रो. जयपाल सिंह ने स्पष्ट किया कि अकादमी कोई अतिरिक्त या असंवैधानिक सुविधा नहीं मांग रही है, बल्कि संविधान में दिए गए अधिकारों और मौजूदा कानूनों को ईमानदारी से लागू करने की मांग कर रही है।
ये हैं अकादमी की 10 प्रमुख मांगें
अकादमी ने मांग की है कि संविदा, आउटसोर्स, उपनल और पीआरडी के माध्यम से होने वाली भर्तियों में आरक्षण रोस्टर का पालन सुनिश्चित किया जाए। सरकारी विभागों, निगमों और विश्वविद्यालयों में अनुसूचित जाति एवं जनजाति के रिक्त बैकलॉग पदों को चिह्नित कर छह माह के भीतर विशेष भर्ती अभियान चलाया जाए।
इसके साथ ही पदोन्नति में आरक्षण बहाल करने और परिणामी वरिष्ठता का लाभ देने की मांग उठाई गई है। छात्रवृत्ति योजनाओं में आय सीमा के कथित दोहरे मापदंड को समाप्त करते हुए अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों के लिए पारिवारिक वार्षिक आय सीमा बढ़ाकर आठ लाख रुपये करने की मांग भी की गई है।
अकादमी ने अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए राज्य और जिला स्तर पर सतर्कता समितियों की नियमित बैठकें कराने तथा मुकदमों, सजा और मुआवजे से संबंधित विवरण सार्वजनिक करने की मांग की है।
शिक्षा के क्षेत्र में बंद किए गए 900 से अधिक सरकारी विद्यालयों को दोबारा खोलने और एक हजार नए आधुनिक एवं आवासीय विद्यालय स्थापित करने का प्रस्ताव रखा गया है। वहीं, भूमिहीन परिवारों को पर्वतीय क्षेत्रों में 40 नाली और मैदानी क्षेत्रों में चार एकड़ कृषि भूमि निःशुल्क आवंटित करने की मांग की गई है।
जातीय उत्पीड़न और सामाजिक बहिष्कार से प्रभावित दलित परिवारों को सुरक्षित एवं विकसित क्षेत्रों में भूमि, आवास और आजीविका की सुविधा के साथ पुनर्वासित करने की मांग भी मांग-पत्र में शामिल है।
इसके अलावा प्रदेश के सभी सरकारी और निजी विश्वविद्यालयों एवं उच्च शिक्षण संस्थानों में बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमाएं स्थापित करने और उनकी स्मृति में शोध पीठों को सक्रिय करने की मांग की गई है। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर राजभवन एवं शासन के आधिकारिक आयोजनों में दलित समाज के साहित्यकारों, कलाकारों, समाजसेवियों और बुद्धिजीवियों को विशेष रूप से सम्मानित करने का आग्रह भी किया गया है।
सत्ता पक्ष और विपक्ष से एकजुट पहल की अपील
प्रो. जयपाल सिंह ने सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों से दलगत राजनीति से ऊपर उठकर प्रदेश की वंचित आबादी के अधिकारों, स्वाभिमान और सामाजिक सुरक्षा के लिए विधानसभा एवं शासन स्तर पर ठोस नीतिगत निर्णय लेने की अपील की।
प्रेस वार्ता में चिरंजीलाल भारती, दलीप चंद्र आर्य, डॉ. देवेंद्र सिंह, कल्याण सिंह सहित अकादमी के अन्य पदाधिकारी एवं सदस्य मौजूद रहे।






