नंदा सुनंदा महोत्सव में दिखी उत्तराखंड की पारंपरिक संस्कृति की झलक

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देहरादून। मां नंदा-सुनंदा देवी महोत्सव के आठवें दिन नित्य पूजा-अर्चना के बाद महिलाओं के लिए पारंपरिक वेशभूषा प्रतियोगिता आयोजित की गई। प्रतियोगिता में उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों की पारंपरिक वेशभूषा में महिलाओं ने प्रतिभाग कर लोक संस्कृति के रंग बिखेरे।

कार्यक्रम संयोजक बबीता साह लोहनी ने महिलाओं को पिछौड़े की परंपरा, उसे धारण करने की विधि और उसके धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि पिछौड़ा केवल पहनावा नहीं, बल्कि कुमाऊं की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसे पूजा-पाठ, विवाह, नामकरण, जनेऊ सहित अन्य शुभ अवसरों पर धारण करने की परंपरा रही है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में पिछौड़ा सामान्य अवसरों पर भी पहना जाने लगा है, ऐसे में इसकी मूल परंपरा और महत्व को नई पीढ़ी तक पहुंचाना आवश्यक है।

प्रतियोगिता के दौरान विभिन्न प्रश्नोत्तरी के माध्यम से भी महिलाओं के ज्ञान और पारंपरिक संस्कृति की जानकारी को परखा गया। इसमें 22 वर्ष से लेकर 70 वर्ष तक की महिलाओं ने उत्साहपूर्वक प्रतिभाग किया। खास बात यह रही कि प्रतियोगिता में केवल कुमाऊंनी और गढ़वाली वेशभूषा ही नहीं, बल्कि बिहार और पंजाब की पारंपरिक वेशभूषा में भी महिलाएं शामिल हुईं। इससे कार्यक्रम में देश की विविध लोक संस्कृतियों की सुंदर झलक देखने को मिली।

कार्यक्रम में कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी, भाजपा महानगर अध्यक्ष सिद्धार्थ अग्रवाल, मुख्यमंत्री के मुख्य सचिव भूपेंद्र बसेरा, जगदीश चंद्र पांडे, सचिवालय मुख्य सुरक्षा अधिकारी जीवन सिंह बिष्ट, ललित मोहन जोशी, सुरेंद्र सिंह बिष्ट, घनश्याम जोशी, ममता पांगती सहित अन्य लोग मौजूद रहे।

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