
देहरादून, 7 अप्रैल। आईसीएआर-भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान (आईआईएसडब्ल्यूसी) देहरादून ने मंगलवार को अपने मुख्यालय में 73वां स्थापना दिवस उत्साह और गरिमा के साथ मनाया। कार्यक्रम में वैज्ञानिकों, अधिकारियों, किसानों और विभिन्न हितधारकों की सक्रिय भागीदारी रही।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में सीएसआईआर-भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (आईआईपी) देहरादून के निदेशक डॉ. हरेंद्र सिंह बिष्ट उपस्थित रहे, जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में स्प्रिंगशेड एवं नदी पुनर्जीवन एजेंसी (सारा) उत्तराखंड की अतिरिक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी आईएफएस अधिकारी कहकशां नसीम ने शिरकत की।
मुख्य अतिथि डॉ. बिष्ट ने मृदा एवं जल संरक्षण के क्षेत्र में संस्थान के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि संस्थान ने भूमि क्षरण को कम करने, वर्षा जल संरक्षण तथा कृषि उत्पादकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने सतत विकास के लिए संरक्षण तकनीकों को ऊर्जा दक्षता के साथ जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।
विशिष्ट अतिथि कहकशां नसीम ने स्प्रिंगशेड और नदी पुनर्जीवन के क्षेत्र में अपने अनुभव साझा करते हुए प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन को मजबूत करने के लिए आईआईएसडब्ल्यूसी और राज्य एजेंसियों के बीच सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता बताई।
संस्थान के निदेशक डॉ. एम. मदहु ने अपने संबोधन में मृदा अपरदन नियंत्रण, भूमि क्षरण में कमी और वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों में उत्पादकता बढ़ाने के लिए संस्थान की उपलब्धियों की जानकारी दी। कार्यक्रम में डॉ. चरण सिंह ने अतिथियों का स्वागत किया और स्थापना दिवस के महत्व पर प्रकाश डाला।
संस्थान की स्थापना वर्ष 1953-54 में हुई थी और यह आईसीएआर के प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन प्रभाग के अंतर्गत कार्य करता है। देश के विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में स्थित क्षेत्रीय केंद्रों के माध्यम से संस्थान स्थान-विशिष्ट तकनीकों का विकास और प्रसार कर रहा है।वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार जल अपरदन के कारण होने वाले भूमि क्षरण में उल्लेखनीय कमी आई है, जो 39.87 प्रतिशत (125.99 मिलियन हेक्टेयर) से घटकर 26.31 प्रतिशत (86.04 मिलियन हेक्टेयर) हो गई है। संस्थान ने जलग्रहण विकास कार्यक्रमों के माध्यम से 100 मिलियन हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में उपचार कार्य किया है।
संस्थान की तकनीकों से फसल उत्पादकता में 40 से 412 प्रतिशत तक वृद्धि, जल उपयोग दक्षता में 30 से 84 प्रतिशत तक सुधार और उर्वरकों में लगभग 10 से 15 हजार करोड़ रुपये की वार्षिक बचत संभव हुई है, जिससे किसानों की आय बढ़ने और जलवायु सहनशीलता मजबूत होने में मदद मिली है।
कार्यक्रम के दौरान प्रगतिशील किसानों को सम्मानित किया गया तथा तकनीकी पुस्तिकाओं और हिंदी पत्रिका ‘बुरांश’ का विमोचन भी किया गया। साथ ही सांस्कृतिक कार्यक्रमों और खेलकूद गतिविधियों का आयोजन किया गया, जिसमें करीब 160 प्रतिभागियों ने भाग लिया।





