सिर्फ कागजी साक्षरता नहीं, शिक्षा की गुणवत्ता पर भी ध्यान दे सरकार : डॉ. सुनील अग्रवाल

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देहरादून, 19 जून। उत्तराखंड कैबिनेट द्वारा राज्य को संपूर्ण साक्षर घोषित किए जाने पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए निजी कॉलेज एसोसिएशन उत्तराखंड के अध्यक्ष डॉ. सुनील अग्रवाल ने प्रदेश सरकार को बधाई दी है। उन्होंने कहा कि राज्य को संपूर्ण साक्षर घोषित किया जाना निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन केवल कागजों पर साक्षरता का दावा करने के बजाय शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक चुनौतियों पर भी गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है।

डॉ. अग्रवाल ने कहा कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में प्रदेश के अशासकीय महाविद्यालय लंबे समय से अनेक समस्याओं का सामना कर रहे हैं। बड़ी संख्या में शिक्षकों के पद रिक्त हैं और निजी महाविद्यालय संबद्धता एवं संबद्धता विस्तार से जुड़े मामलों में विश्वविद्यालयों से लेकर राजभवन सचिवालय तक विभिन्न स्तरों पर अनावश्यक परेशानियों का सामना करते हैं।
उन्होंने कहा कि निर्धारित मानकों को शत-प्रतिशत पूरा करना व्यवहारिक रूप से कठिन है। ऐसे में निजी महाविद्यालय अनावश्यक दबाव और प्रशासनिक जटिलताओं के विरोध में भी खुलकर आवाज नहीं उठा पाते। उन्होंने समर्थ पोर्टल की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि प्रवेश प्रक्रिया के दौरान पोर्टल को बार-बार खोलने और बंद करने से छात्र परेशान होते हैं। यदि पूरे प्रवेश सत्र में पोर्टल खुला रखा जाए तो छात्रों और संस्थानों दोनों को सुविधा मिल सकती है।
डॉ. अग्रवाल ने आरोप लगाया कि नई शिक्षा नीति को प्रदेश में पर्याप्त तैयारी के बिना जल्दबाजी में लागू किया गया, जिसके कारण अनेक व्यावहारिक समस्याएं सामने आ रही हैं। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों में छात्रों की छोटी-छोटी समस्याओं के समाधान के लिए भी कॉलेज संचालकों को लगातार चक्कर लगाने पड़ते हैं।
उन्होंने विशेष रूप से श्री देव सुमन उत्तराखंड विश्वविद्यालय का उल्लेख करते हुए कहा कि महाविद्यालयों द्वारा भेजे गए पत्रों और ई-मेल का समय पर जवाब तक नहीं दिया जाता। इसके अलावा राज्य विश्वविद्यालयों से संबद्ध अधिकांश निजी कॉलेजों को वर्ष 2019 के बाद से संबद्धता विस्तार पत्र प्राप्त नहीं हुए हैं, जबकि वे नियमित रूप से शुल्क जमा करते हैं और निरीक्षण प्रक्रिया भी पूरी करते हैं।
डॉ. अग्रवाल ने कहा कि इस विषय को विश्वविद्यालय प्रशासन से लेकर मंत्री स्तर तक उठाया गया, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया है। उन्होंने चिंता जताई कि संबद्धता विस्तार पत्रों के अभाव में छात्रों की छात्रवृत्तियां प्रभावित हो सकती हैं और भविष्य में उनकी डिग्रियों की वैधता पर भी प्रश्नचिह्न खड़े हो सकते हैं।
उन्होंने कहा कि किसी भी समाज और राज्य की प्रगति केवल साक्षरता दर बढ़ाने से नहीं होती, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता, संस्थागत पारदर्शिता और छात्रों को मिलने वाली सुविधाओं से होती है। इसलिए सरकार को साक्षरता के साथ-साथ शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता सुधारने और उच्च शिक्षा संस्थानों की समस्याओं के समाधान पर भी प्राथमिकता से ध्यान देना चाहिए।

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