विश्व पुस्तक मेला 2026: किताबों से फिर जुड़ा बचपन, स्कूली छात्रों की ऐतिहासिक मौजूदगी

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देहरादून 16 जनवरी। डिजिटल युग में, जब बच्चों का अधिकांश समय मोबाइल और स्क्रीन तक सीमित होता जा रहा है, ऐसे दौर में विश्व पुस्तक मेला 2026 में स्कूली छात्रों की अभूतपूर्व भागीदारी एक सुखद और आशाजनक संकेत बनकर उभरी है। दिल्ली–एनसीआर में कड़ाके की शीतलहर के बावजूद शुक्रवार को मेले में उमड़ी स्कूली छात्रों की भारी भीड़ ने यह साबित कर दिया कि किताबों के प्रति बच्चों का आकर्षण आज भी पूरी तरह जीवंत है।
मेले में स्कूली बच्चे फिक्शन, नॉन-फिक्शन, कॉमिक्स, ग्राफिक नॉवेल्स जैसे डॉगमैन, जेरोनिमो, वीडियो गेम आधारित किताबें (माइनक्राफ्ट, रोब्लॉक्स) सहित विविध विधाओं की पुस्तकों में गहरी रुचि लेते नजर आए। दो दिन पहले ही बच्चों ने अंतरिक्ष यात्रियों और अन्य प्रेरणादायक हस्तियों से संवाद, कहानी सुनाने के सत्रों और रचनात्मक कार्यशालाओं में उत्साहपूर्वक भाग लिया।
भारत के प्रथम अंतरिक्ष यात्री ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने सैकड़ों स्कूली छात्रों और उनके परिजनों से सीधे संवाद करते हुए अपने अनुभव साझा किए। सादगी और सहज हास्य के साथ उन्होंने कहा, “मैं अंतरिक्ष में अकेला नहीं गया था, मेरे साथ देश के एक अरब लोगों की दुआएं थीं।” उन्होंने बच्चों को प्रेरित करते हुए विश्वास दिलाया कि आने वाले समय में कोई भी छात्र भारत के अंतरिक्ष अभियानों का नेतृत्व कर सकता है।
विश्व पुस्तक मेले के आयोजक राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (एनबीटी) की पहल की शिक्षाविदों और अभिभावकों ने सराहना की है। एनबीटी द्वारा बच्चों तक पुस्तकों को पहुंचाने और उनमें पढ़ने की आदत विकसित करने के लिए किए गए प्रयास साफ नजर आए। विभिन्न स्कूलों से आए छात्रों ने न केवल किताबों की खरीदारी की, बल्कि लेखकों से संवाद, बाल साहित्य सत्रों और रचनात्मक गतिविधियों में भी सक्रिय भागीदारी निभाई।
मेले में बच्चों के लिए विशेष रूप से तैयार किए गए स्टॉल, चित्र पुस्तकों, ज्ञानवर्धक सामग्री और कहानियों की रंगीन दुनिया ने मानो उनके बचपन को किताबों से जोड़ दिया। शिक्षकों और अभिभावकों का मानना है कि इस तरह के आयोजन बच्चों में कल्पनाशीलता, सोचने की क्षमता और भाषा कौशल को मजबूत करते हैं।
स्कूली बच्चों के साथ-साथ किशोरों की मौजूदगी भी उल्लेखनीय रही। कई किशोरों के हाथों में अंग्रेजी उपन्यास, शॉर्ट स्टोरी कलेक्शन और जीवनियाँ दिखाई दीं। उनका मानना है कि अंग्रेजी उपन्यास केवल शब्दावली ही नहीं, बल्कि सोचने का दृष्टिकोण, संवाद की शैली और आत्मविश्वास भी विकसित करते हैं। किशोरों का कहना है कि वे भाषा को रटते नहीं, बल्कि साहित्य के माध्यम से उसे महसूस करते और जीते हैं।
विश्व पुस्तक मेला केवल पुस्तकों का बाजार नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कृति और विचारों का संगम है। स्कूली छात्रों की यह ऐतिहासिक मौजूदगी इस बात का प्रमाण है कि यदि सही मंच और प्रेरक वातावरण मिले, तो नई पीढ़ी को किताबों से जोड़ना आज भी पूरी तरह संभव है।

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