चीड़ अब वनग्नि का कारण नहीं बल्कि यूकॉस्ट ने बनाया आमदनी का ज़रिया

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यूकॉस्ट की इस पहल को अन्य लोग भी अपनाने के लिए आ रहे है आगे।

रीठासाहिब 4 मई ।लधियाघाटी क्षेत्र में चीड़ की बाहुलता के कारण उसकी पत्तियाँ दावाग्नि का मुख्य कारण हुआ करती थी, लेकिन अब यूकॉस्ट यानी उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद ने इसको आमदनी का ज़रिया बनाते हुए महिलाओं ले लिए घर बैठे रोज़गार का एक माध्यम बना दिया है। मॉडल जिले की नोडल एजेंसी यूकॉस्ट के महानिदेशक दुर्गेश पंत ने भारतीय पेट्रोलियम संस्थान देहरादून के साथ तकनीकी सहयोग कर पिरुल से ब्रिकेट बनाने की योजना पर कार्य शुरू किया। यह ब्रिकेट ऊर्जा का ऐसा सस्ता व लाभकारी माध्यम बनने लगा कि इसकी हर जगह मांग होने लगी।
यूकॉस्ट की इस पहल को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने महानिदेशक दुर्गेश पंत की दूरगामी सोच का ऐसा परिणाम बताया जिससे जंगलो को धधकने से बचाने के साथ आग लगने का कारण बने पिरूल को अर्थव्यवस्था से जोड़कर अब इसे पर्यावरण संरक्षण का एक मजबूत साधन भी बना दिया है। महानिदेशक पंत का कहना है कि यह प्रयास सामुदायिक पहल का ऐसा नमूना है जिसमे स्थानीय समुदाय, वन विभाग, जिला प्रशासन द्वारा आपसी सहयोग एवं समन्वय के बल पर ही सफल हो पाया है। आज पूरे हिमालय क्षेत्र के लोग इस तकनीक को अपनाने के लिए भिंगराडा आकर अध्ययन कर रहे है की किस प्रकार उज्ज्वला महिला ग्राम संगठन द्वारा अपने संगठित प्रयासों से प्रकृति को बचाने जो कार्य किया गया है उसकी अन्य कोई जगह मिसाल नहीं है।
महानिदेशक प्रोफेसर पंत का मानना है कि उत्तराखंड के वनों को होने वाले नुकसान का असर देश पर तो पड़ता है इससे उत्तराखंड जिसे हम एक पर्यटक हब के रूप में बनाने जा रहे है उस परिकल्पना को भी आघात पहुंचता है। गर्मियों में जब मैदानी क्षेत्र तपने लगते है तब लोग ठंडी हवा व पानी के लिए पहाड़ी की ओर लोग आते है लेकिन यहाँ जंगलो से निकलने वाले धूल, धुए, धुंध एवं तपिश से हम उनका स्वागत करते आ रहे थे। भिंगराडा मॉडल ने अब सभी स्थानों में इसे अपनाने के लिए प्रेरित कर दिया है। शासन द्वारा पिरुल की खरीद 10 रुपये प्रति किलो किए जाने से यह रोज़गार का अच्छा ज़रिया बन गया है। पिरुल की ब्रिकेट्स किफ़ायती होने के साथ प्रज्वलन होने से इसकी लगातार माँग बढ़ती जा रही है।

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