दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में ‘खबरपात’ के पांचवें संस्करण में छलका आंदोलनकारियों का दर्द

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

छात्राओं के माथे पर बिंदी लगाकर बचाया दरिंदों से – रामपुर तिराहा कांड की आंखोंदेखी सुन भावुक हुई ऊषा भट्ट

देहरादून, 13 नवम्बर।
दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में आयोजित मासिक संवाद कार्यक्रम ‘खबरपात’ के पांचवें संस्करण में इस बार उत्तराखंड राज्य आंदोलन पर चर्चा केंद्रित रही। कार्यक्रम में छह आंदोलनकारियों ने उस दौर के अपने अनुभव साझा किए। अपने संस्मरण सुनाते हुए कई आंदोलनकारी भावुक हो उठे। उनका कहना था कि जिस उत्तराखंड की उन्होंने कल्पना की थी, वैसा राज्य नहीं मिला।

आंदोलनकारी ऊषा भट्ट ने कार्यक्रम में रामपुर तिराहा कांड का आंखों देखा हाल सुनाया। उन्होंने बताया कि “एक अक्टूबर को हम गोपेश्वर से चले थे। हमारे साथ 24 लोग थे, जिनमें 14 कर्मचारी, 7 गृहणियां और 3 छात्राएं थीं। ऋषिकेश तपोवन से ही रोका जाने लगा और रामपुर तिराहा पर अंतिम बार बसों को रोका गया।” उन्होंने बताया कि बसों पर पथराव किया गया, शीशे तोड़ दिए गए और महिलाओं को घसीटा जाने लगा। उस भयावह माहौल में “हमारी बस की महिलाओं ने छात्राओं के माथे पर बिंदी लगाकर उन्हें दरिंदों से बचाया।”

आंदोलनकारी ओमी उनियाल ने बताया कि वे घटना के बाद मौके पर पहुंचे तो “कई लोग लापता थे और सब बदहवास थे, लेकिन आसपास के गांवों—खासकर मुस्लिम समुदाय के लोगों ने—मदद का हाथ बढ़ाया, मस्जिदों और मदरसों के दरवाजे खोल दिए।”

निर्मला बिष्ट, जो आंदोलन के दौरान सबसे लंबे समय तक जेल में रहीं, ने कहा कि आंदोलन में सभी वर्गों के लोग साथ थे—“उस समय न हिन्दू-मुसलमान की बात थी, न देसी-पहाड़ी की।” उन्होंने माना कि “दो अभी दो उत्तराखंड राज्य दो” का नारा भावनात्मक था, पर ठोस ब्लूप्रिंट के अभाव का खामियाजा आज झेलना पड़ रहा है।

जनगीत गायक सतीश धौलाखंडी ने कहा कि जब आंदोलन शिथिल पड़ता या लोग थकान महसूस करते, तब सांस्कृतिक मोर्चा गीतों और नाटकों के माध्यम से नई ऊर्जा भरता था। उन्होंने उस दौर के प्रेरक जनगीत भी प्रस्तुत किए।

कार्यक्रम का संचालन त्रिलोचन भट्ट ने किया, जिन्होंने 2 अक्टूबर 1994 को लाल किले पर हुए घटनाक्रम का विस्तृत विवरण दिया। उन्होंने बताया कि “मुजफ्फरनगर की घटना से अनभिज्ञ उत्तराखंड के लोगों ने दिल्ली पुलिस के साथ भी जबरदस्त संघर्ष किया था।”

कार्यक्रम में विशेष अतिथि डॉ. उमा भट्ट ने कहा कि आंदोलन की हर घटना का दस्तावेजीकरण आवश्यक है, ताकि आने वाली पीढ़ियों को उस इतिहास की सच्चाई जानने का अवसर मिल सके।

इस मौके पर कमला पंत, नन्द नन्दन पांडे, प्रो. राघवेन्द्र, हरिओम पाली, बी.के. डोभाल, चंद्रकला, विनय रावत, दिनेश शास्त्री, चंद्रशेखर तिवारी, सुंदर सिंह बिष्ट, जादीश सिंह महर, स्वाति नेगी, दीपा कौशलम, परमजीत सिंह कक्कड़, कविता कृष्णपल्लवी, लुशुन टोडरिया, पद्मा गुप्ता, विजय नैथानी, शांता नेगी सहित बड़ी संख्या में महिलाएं एवं अन्य लोग उपस्थित थे।

Leave a Comment

और पढ़ें