
देहरादून, 15 अक्टूबर। मुख्य सचिव आनन्द बर्द्धन ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ रही चुनौतियों और आपदाओं के प्रभाव को कम करने में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इसके लिए आधुनिक तकनीक के प्रभावी उपयोग के साथ सतत विकास की योजनाओं में स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना जरूरी है।
मुख्य सचिव ने गुरुवार को दून विश्वविद्यालय में ‘बदलती जलवायु में हिमालय : आपदाएं, सतत विकास एवं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भूमिका’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ किया। उन्होंने कहा कि हिमालय की भौगोलिक संवेदनशीलता को देखते हुए आपदाओं के आकलन, संभावित प्रभावों के पूर्वानुमान और जोखिम कम करने के लिए नवीन तकनीकों का उपयोग किया जाना चाहिए। तकनीक आधारित समाधान स्थानीय जरूरतों और परिस्थितियों के अनुरूप होने चाहिए, ताकि उनका सीधा लाभ आमजन तक पहुंच सके।
दक्षिण कैरोलिना विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एवं आईएआईआरओ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और संस्थापक निदेशक प्रो. अमित शेठ ने एआई की उभरती तकनीक ‘स्मॉल एआई’ की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सीमित संसाधनों में सुलभ और प्रभावी तकनीकी समाधान विकसित कर भारत की विशिष्ट विकास संबंधी जरूरतों को पूरा किया जा सकता है। हिमालयी क्षेत्र में लगातार सामने आ रही आपदाओं से निपटने में भी इन तकनीकों का उपयोग उपयोगी साबित हो सकता है।
अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन के संयुक्त सचिव डॉ. निशांत वर्मा ने दून विश्वविद्यालय में विकसित हो रहे शोध वातावरण की सराहना की और देश में अनुसंधान गतिविधियों को बढ़ावा देने में संस्था की भूमिका पर प्रकाश डाला।
दून विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. सुरेखा डंगवाल ने विश्वविद्यालय की शैक्षणिक एवं शोध उपलब्धियों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि शिक्षकों और शोधार्थियों के प्रयासों से विश्वविद्यालय में अनुसंधान गतिविधियों को लगातार मजबूत किया जा रहा है।
संगोष्ठी में जलवायु परिवर्तन से हिमालयी क्षेत्र में उत्पन्न खतरों, आपदा आकलन, जोखिम न्यूनीकरण, सतत विकास तथा शोध, नियोजन और निर्णय प्रक्रिया में एआई के उपयोग पर विशेषज्ञ व्याख्यान एवं परिचर्चाएं आयोजित की जा रही हैं। इसमें दिल्ली विश्वविद्यालय, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की सहित देश के विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों के विशेषज्ञ, शिक्षाविद, शोधार्थी और दून विश्वविद्यालय के शिक्षक प्रतिभाग कर रहे हैं। संगोष्ठी के संयोजक एवं भूविज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. विपिन कुमार सहित अन्य अधिकारी एवं विशेषज्ञ मौजूद रहे।









