
हिमालय परिषद् के संसाधनों के लिए एक करोड़ रुपये देने की घोषणा, बोले—इकोलॉजी और इकोनॉमी के संतुलन से निकलेगा उत्तराखण्ड के विकास का रास्ता
देहरादून 7 सितंबर ।मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हिमालय दिवस के उपलक्ष्य में सोमवार को वीर माधो सिंह भण्डारी उत्तराखण्ड प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में आयोजित ‘हिमालयो नाम नगाधिराजः’ कार्यक्रम में प्रतिभाग किया। मुख्यमंत्री ने हिमालय परिषद् में मूलभूत सुविधाओं और संसाधनों के विकास के लिए एक करोड़ रुपये की धनराशि देने की घोषणा की।
मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमालय के संरक्षण, संवर्धन और सतत विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा हिमालयी क्षेत्रों के लिए समर्पित विशिष्ट व्यक्तित्वों को अब हर वर्ष ‘हिमालय विभूति सम्मान’ से सम्मानित किया जाएगा। यह सम्मान प्रत्येक वर्ष हिमालय दिवस के अवसर पर प्रदान किया जाएगा।
कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से जुड़े पांच पोस्टरों का विमोचन किया। इनमें 7वें देहरादून इंटरनेशनल साइंस एंड टेक्नोलॉजी फेस्टिवल, साइंस एंड टेक्नोलॉजी प्रीमियर लीग, सीमांत बाल विज्ञान कांग्रेस, ज्ञानोत्कर्ष और 21वीं उत्तराखण्ड राज्य साइंस कॉन्फ्रेंस के पोस्टर शामिल हैं। उन्होंने विज्ञान के लोकप्रियकरण पर केंद्रित पत्रिका ‘विज्ञान संप्रेषण’ के पांचवें वार्षिकांक का भी विमोचन किया।
मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमालय केवल पर्वत श्रृंखला नहीं, बल्कि हमारी पहचान, संस्कृति और अस्तित्व का आधार है। गंगा और यमुना सहित अनेक जीवनदायिनी नदियों का उद्गम हिमालय से होता है। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव हिमालयी क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। ग्लेशियरों पर बढ़ता दबाव, पारंपरिक जल स्रोतों पर संकट, अतिवृष्टि, भूस्खलन, वनाग्नि और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी घटनाएं लगातार नई चुनौतियां खड़ी कर रही हैं।
उन्होंने कहा कि हिमालय की संवेदनशीलता का सम्मान करते हुए विकास कार्यों में विज्ञान, तकनीक, सुरक्षा और प्रकृति के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तराखण्ड के विकास का मॉडल राज्य की भौगोलिक परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिए।
“उत्तराखण्ड के विकास का रास्ता इकोलॉजी और इकोनॉमी के संतुलन से होकर ही निकलेगा। हमें ऐसा विकास चाहिए जिसमें सड़क भी बने और जंगल भी बचें, रोजगार भी बढ़े और नदियां भी निर्मल रहें तथा पर्यटन के साथ पहाड़ों की धारण क्षमता का भी ध्यान रखा जाए।”
मुख्यमंत्री ने कहा कि जलवायु परिवर्तन की चुनौती किसी राज्य या देश की सीमाओं तक सीमित नहीं है। पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने में कम योगदान देने वाले हिमालयी क्षेत्रों को भी इसका बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। इसलिए हिमालयी राज्यों की चिंता और आवाज को राष्ट्रीय तथा वैश्विक मंचों तक मजबूती से पहुंचाने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियां हमसे केवल बड़ी इमारतों और चौड़ी सड़कों का हिसाब नहीं मांगेंगी, बल्कि स्वच्छ हवा, स्वच्छ पानी, नदियों और जंगलों का भी हिसाब मांगेंगी। इसलिए आज ही तय करना होगा कि भविष्य की पीढ़ियों को कैसा उत्तराखण्ड सौंपकर जाना है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमालय संरक्षण के लिए जनभागीदारी सबसे महत्वपूर्ण है। इसी उद्देश्य से 2 सितंबर के बुग्याल दिवस से 9 सितंबर के हिमालय दिवस तक पूरे सप्ताह को ‘हिमालय दिवस सप्ताह’ के रूप में मनाने की शुरुआत की गई है। उन्होंने कहा कि हिमालय संरक्षण केवल सरकारी कार्यक्रमों और सेमिनारों तक सीमित न रहकर जन-जन का आंदोलन बनना चाहिए।
मुख्यमंत्री ने कहा कि बुग्याल जैव विविधता और जल स्रोतों के महत्वपूर्ण आधार हैं, जबकि जंगल हवा, पानी और मिट्टी के रक्षक हैं। हिमालय संरक्षण को पहाड़ की समृद्धि से जोड़ने की जरूरत है। गांवों में रोजगार, स्थानीय उत्पादों को बाजार, मातृशक्ति का आर्थिक सशक्तिकरण, प्राकृतिक खेती और पर्यावरण अनुकूल पर्यटन को बढ़ावा देकर पलायन को कम किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि हिमालय का संरक्षण और पहाड़ की समृद्धि एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। जंगल, बुग्याल, जैव विविधता, नदियां, पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय उत्पाद उत्तराखण्ड की इकोलॉजिकल वेल्थ हैं और भविष्य में यही राज्य की इकोनॉमिक स्ट्रेंथ भी बन सकते हैं।
कार्यक्रम में विधायक किशोर उपाध्याय, हेस्को के संस्थापक एवं पद्म भूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी, विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. तृप्ता ठाकुर, महानिदेशक यू-कॉस्ट प्रो. दुर्गेश पंत, रजिस्ट्रार डॉ. राजेश उपाध्याय, संयुक्त निदेशक डी.पी. उनियाल सहित अन्य गणमान्य उपस्थित रहे।









