महुआ बीनने वाले हाथों ने संभाली उद्यमिता की कमान

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सरगुजा की महिला सहकारी समिति का आत्मनिर्भर मॉडल बना मिसाल, प्रबंधन संस्थानों को केस स्टडी के लिए आमंत्रण

सरगुजा/छत्तीसगढ़ 02 सितम्बर। हसदेव अंचल के सुदूर आदिवासी क्षेत्र की महिलाओं ने आत्मनिर्भरता और उद्यमिता की ऐसी मिसाल पेश की है, जिसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदलने का दावा किया है। कभी महुआ और वनोपज पर निर्भर रहने वाली आदिवासी महिलाएं आज सहकारी समिति के माध्यम से करोड़ों रुपये के वार्षिक कारोबार का संचालन कर रही हैं।

सरगुजा जिले में कार्यरत महिला उद्यमी बहुउद्देशीय सहकारी समिति (मर्यादित) यानी एमयूबीएसएस (MUBSS) के अनुसार, समिति का वार्षिक कारोबार करीब 3 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। समिति से जुड़ी महिलाओं ने देश के प्रतिष्ठित प्रबंधन संस्थानों और विशेषज्ञों को इस मॉडल का अध्ययन कर इस पर केस स्टडी तैयार करने का आमंत्रण दिया है।

खेत से स्कूल की थाली तक बना आत्मनिर्भरता का मॉडल

समिति ने महिला स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से स्थानीय स्तर पर जैविक फल और सब्जियों का उत्पादन शुरू किया है। इन उत्पादों का उपयोग क्षेत्र में संचालित एक सीबीएसई अंग्रेजी माध्यम स्कूल में एक हजार से अधिक बच्चों के भोजन की व्यवस्था में किए जाने का दावा किया गया है।

इसके साथ ही समिति से जुड़ा एक महिला समूह डेयरी का संचालन भी कर रहा है। यहां से मिलने वाला दूध बच्चों के नाश्ते में उपलब्ध कराया जाता है। समिति का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य स्थानीय बच्चों के पोषण स्तर को बेहतर बनाना और महिलाओं को नियमित आर्थिक गतिविधियों से जोड़ना है।

2017 में हुई शुरुआत, अब कई क्षेत्रों में कारोबार

एमयूबीएसएस की शुरुआत वर्ष 2017 में कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) पहल के तहत महिलाओं को संगठित कर की गई थी। बीते वर्षों में समिति ने कई व्यावसायिक गतिविधियों का विस्तार किया है।

समिति वर्तमान में मसाला उद्योग, सेनेटरी पैड निर्माण, फिनाइल, हैंडवॉश और साबुन उत्पादन, मशरूम उत्पादन, जैविक केंचुआ खाद तथा मिनी राइस मिल जैसी गतिविधियों से भी जुड़ी है। इसके अलावा स्कूल कैंटीन, डेयरी और सब्जी उत्पादन के जरिए भी महिलाओं को रोजगार और आय के अवसर मिल रहे हैं।

‘केवल महुआ के भरोसे नहीं संवर सकता भविष्य’

समिति से जुड़ी महिलाओं का कहना है कि हसदेव जैसे दुर्गम क्षेत्रों में रोजगार के सीमित साधनों के बीच उद्यमिता ने उनके लिए नई संभावनाएं पैदा की हैं।

महिला समिति की सदस्यों ने कहा कि आने वाली पीढ़ियों के बेहतर भविष्य के लिए केवल महुआ और वनोपज पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। उनका कहना है कि वे देश के बड़े प्रबंधन संस्थानों और विशेषज्ञों को क्षेत्र में आकर उनके उद्यमिता मॉडल का अध्ययन करने और जमीनी स्तर पर इसके प्रभाव को समझने के लिए आमंत्रित करती हैं।

रोजगार के साथ शिक्षा और स्वास्थ्य पर भी फोकस

महिलाओं की आर्थिक गतिविधियों के साथ क्षेत्र में बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं पर भी काम किए जाने का दावा किया गया है। सीबीएसई अंग्रेजी माध्यम स्कूल में स्थानीय आदिवासी बच्चों को मुफ्त शिक्षा उपलब्ध कराई जा रही है। इसके तहत किताबें, कॉपियां, यूनिफॉर्म और परिवहन सुविधा के साथ कमजोर विद्यार्थियों के लिए अतिरिक्त कक्षाएं भी संचालित की जाती हैं।

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए विशेषज्ञों की सहायता, ऑनलाइन शिक्षा के लिए टैबलेट वितरण, स्थानीय लोगों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं और आधुनिक खेती को बढ़ावा देने के लिए किसान क्लब जैसी पहल भी संचालित की जा रही हैं।

वनीकरण और विकास का दावा

क्षेत्र में संचालित परियोजनाओं के साथ बड़े स्तर पर वनीकरण गतिविधियां किए जाने का भी दावा किया गया है। समिति और परियोजना से जुड़े लोगों का कहना है कि स्थानीय आजीविका, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।

हसदेव अंचल की इन महिलाओं की कहानी केवल कारोबार की सफलता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीमित संसाधनों वाले दूरस्थ क्षेत्रों में महिला सामूहिकता, कौशल और उद्यमिता के जरिए आत्मनिर्भरता की नई राह बनाने की मिसाल के रूप में सामने आ रही है।

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