भारत की एकता और प्रगति को समर्पित था डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन : प्रधानमंत्री मोदी

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नई दिल्ली 5 जुलाई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उनका संपूर्ण जीवन भारत की एकता, अखंडता और राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित रहा। उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी ने अपने विचारों, साहस और बलिदान से आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रधानमंत्री ने कहा कि विशेषाधिकार प्राप्त परिवार में जन्म लेने के बावजूद डॉ. मुखर्जी ने आरामदायक जीवन छोड़कर राष्ट्रसेवा का मार्ग चुना। निजी जीवन में अनेक दुखों का सामना करने के बावजूद उनका संकल्प कभी कमजोर नहीं पड़ा।
उन्होंने कहा कि देश के विभाजन के समय डॉ. मुखर्जी ने पश्चिम बंगाल को भारत का अभिन्न हिस्सा बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में जम्मू-कश्मीर के पूर्ण एकीकरण के लिए उनका संघर्ष और बलिदान भारतीय इतिहास का अमिट अध्याय बन गया। प्रधानमंत्री ने कहा कि वर्ष 2019 में अनुच्छेद 370 का निरसन और अनुच्छेद 35ए को हटाना उनके सपनों को साकार करने की दिशा में सबसे बड़ी श्रद्धांजलि थी।
प्रधानमंत्री ने डॉ. मुखर्जी के शैक्षणिक योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने और उन्होंने शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का माध्यम बनाने पर बल दिया। उनके नेतृत्व में विश्वविद्यालय में शोध, पुस्तकालयों के विकास, विज्ञान, कृषि, खेल और छात्र कल्याण जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय सुधार किए गए।उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना ऐसे समय में की, जब देश में एक मजबूत वैकल्पिक राजनीतिक विचारधारा की आवश्यकता थी। उनका मानना था कि भारत का विकास उसकी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़कर ही संभव है।
प्रधानमंत्री ने डॉ. मुखर्जी के पहले उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में योगदान को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि दामोदर वैली कॉर्पोरेशन, सिंदरी उर्वरक संयंत्र और औद्योगिक नीति जैसे कदमों ने आधुनिक औद्योगिक भारत की नींव रखी। साथ ही उन्होंने कुटीर उद्योग, हथकरघा और कारीगरों के संरक्षण पर भी समान रूप से जोर दिया।
प्रधानमंत्री ने कहा कि डॉ. मुखर्जी लोकतांत्रिक मूल्यों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने तत्कालीन सरकार की नीतियों का लोकतांत्रिक तरीके से विरोध किया और राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखा।
उन्होंने वर्ष 1943 के बंगाल अकाल और 1942 के भीषण चक्रवात के दौरान डॉ. मुखर्जी द्वारा किए गए राहत एवं पुनर्वास कार्यों का भी उल्लेख किया और कहा कि वे केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि संवेदनशील समाजसेवी भी थे।
प्रधानमंत्री ने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के आदर्शों से प्रेरणा लेकर मजबूत, आत्मनिर्भर, एकजुट और विकसित भारत के निर्माण के लिए पूरे समर्पण के साथ कार्य करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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