
देहरादून, 13 जनवरी।
आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिकों ने जल से विषैले प्लास्टिक प्रदूषकों को तेज़ी से हटाने के लिए एक अभिनव नैनो-सक्षम तकनीक विकसित कर महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। यह नवाचार भारत के सतत विकास लक्ष्यों के साथ-साथ प्लास्टिक प्रदूषण और जल संदूषण से निपटने के वैश्विक प्रयासों के अनुरूप है।
आईआईटी रुड़की के शोधकर्ताओं द्वारा विकसित बहु-पोषक नैनोफॉस्फेट कण सूक्ष्म पोषक-भंडार के रूप में कार्य करते हैं। ये कण फॉस्फोरस, मैग्नीशियम, कैल्शियम और सूक्ष्म धातुओं जैसे आवश्यक तत्वों को धीरे-धीरे उसी समय और स्थान पर मुक्त करते हैं, जब प्रदूषक-विघटन करने वाले जीवाणुओं को उनकी आवश्यकता होती है। इस प्रक्रिया में द्वितीयक प्रदूषण उत्पन्न नहीं होता, जो इसे पारंपरिक तरीकों से कहीं अधिक सुरक्षित और प्रभावी बनाता है।
एसीएस ईएस एंड टी वॉटर जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, इन विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए नैनोफॉस्फेट कणों ने जीवाणुओं की सक्रियता को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाया। इसके परिणामस्वरूप, कुछ ही घंटों में फ़्थेलेट्स जैसे खतरनाक प्लास्टिक योजकों का लगभग पूर्ण निष्कासन संभव हुआ। फ़्थेलेट्स प्लास्टिक में लचीलापन और टिकाऊपन बढ़ाने के लिए उपयोग किए जाते हैं, लेकिन ये मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा माने जाते हैं और हार्मोनल असंतुलन, प्रजनन तथा विकास संबंधी समस्याओं से जुड़े हैं।
शोध में यह भी सामने आया कि जब इन नैनोफॉस्फेट कणों को प्रदूषक-विघटन जीवाणु रोडोकोकस जोस्टीआई आरएचए1 के साथ प्रयोग किया गया, तो बिना किसी अतिरिक्त पोषक माध्यम के केवल तीन घंटों में साधारण जल में भी फ़्थेलेट्स को हटाया जा सका। जीवाणुओं की वृद्धि बिना किसी विलंब के तुरंत शुरू हो गई, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि नैनोकणों से पोषक-तत्वों की उपलब्धता तुरंत संभव हुई।
यह तकनीक नल जल, नदी जल और कृत्रिम अपशिष्ट जल जैसे विभिन्न वास्तविक जल नमूनों में भी समान रूप से प्रभावी पाई गई। उन्नत सूक्ष्मदर्शी और रासायनिक विश्लेषणों से यह पुष्टि हुई कि जीवाणु नैनोफॉस्फेट कणों पर सक्रिय रूप से उपनिवेश बनाते हैं और नियंत्रित रूप से पोषक-तत्व प्राप्त करते हैं, जिससे जल की गुणवत्ता प्रभावित हुए बिना जैव-विघटन की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है।
आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रोफेसर के. के. पंत ने इस उपलब्धि पर कहा कि यह शोध वैश्विक सततता चुनौतियों के समाधान के लिए विज्ञान-आधारित नवाचार विकसित करने की संस्थान की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस अवधारणा को अन्य प्रदूषकों और सूक्ष्मजीवी प्रणालियों तक भी विस्तारित किया जा सकता है, जिससे जल और मृदा पुनर्स्थापन के लिए कम-लागत, मापनीय और पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों का मार्ग प्रशस्त होगा।







