पिछौड़ा केवल पहनावा नहीं, कुमाऊं की संस्कृति और नारी सम्मान की पहचान : कूर्मांचल परिषद

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देहरादून 8 अक्टूबर ।कूर्मांचल सांस्कृतिक कल्याण परिषद ने कहा कि पिछौड़ा केवल चुन्नी या दुपट्टा नहीं, बल्कि कुमाऊं की समृद्ध लोकसंस्कृति, आस्था, परंपरा और नारी सम्मान का अभिन्न प्रतीक है। परिषद ने महिलाओं से पिछौड़े की सांस्कृतिक गरिमा और पारंपरिक पहचान को समझते हुए इसे उचित अवसरों पर सही तरीके से धारण करने की अपील की।

उत्तरांचल प्रेस क्लब में आयोजित पत्रकार वार्ता में कूर्मांचल सांस्कृतिक कल्याण परिषद पदाधिकारियों ने कहा कि पारंपरिक रूप से पिछौड़े का संबंध विवाह, नामकरण, जनेऊ, पूजा-पाठ, दीपावली, हरेला और शिव आराधना जैसे शुभ अवसरों से रहा है। समय के साथ पिछौड़ा विवाह समारोहों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और विभिन्न आयोजनों में भी लोकप्रिय हुआ है। परिषद का उद्देश्य इसके प्रसार के साथ-साथ इसके पीछे छिपी सांस्कृतिक भावना और परंपरागत गरिमा को संरक्षित करना है।

परिषद ने कहा कि आधुनिक दौर में पिछौड़ा कई आयोजनों में केवल फैशन और दिखावे के लिए पहना जाने लगा है। कई बार इसे सही तरीके से धारण नहीं किया जाता और समारोहों में इसका एक सिरा जमीन पर घिसटता हुआ दिखाई देता है। इससे पिछौड़े की गरिमा प्रभावित होती है। परिषद ने महिलाओं से आग्रह किया कि वे इसे केवल फैशन का हिस्सा न बनाएं, बल्कि अपनी संस्कृति और विरासत के प्रतीक के रूप में सम्मान के साथ धारण करें।

परिषद ने कुमाऊं की होली में पिछौड़ा नहीं पहनने की पारंपरिक वजह भी बताई। परिषद के अनुसार होली के दौरान कच्चे रंगों का प्रयोग होता है और छलड़ी के दिन रंगों को धोया जाता है, जबकि पिछौड़े में पक्के रंगों का इस्तेमाल होता है। इसलिए परंपरागत रूप से होली के अवसर पर पिछौड़ा पहनने की परंपरा नहीं रही है।

परिषद ने कहा कि उसका प्रयास परंपरा को केवल पहनने तक सीमित रखना नहीं, बल्कि उसे समझने और अगली पीढ़ी तक सम्मान के साथ पहुंचाना है। नई पीढ़ी पिछौड़े को केवल आधुनिक फैशन के रूप में न देखकर अपनी जड़ों, विरासत और सांस्कृतिक पहचान के प्रतीक के रूप में समझे, यही परिषद का उद्देश्य है।

परिषद पदाधिकारियों ने कहा कि आज पिछौड़ा लगभग हर समारोह का हिस्सा बनता जा रहा है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि इसे हर अवसर पर अनिवार्य रूप से पहना जाए। सही अवसर पर सही पहनावा ही परंपरा की गरिमा को बनाए रखता है। उन्होंने महिलाओं से विशेष रूप से अपील की कि पिछौड़े को सम्मान दें और इसे पारंपरिक तरीके से धारण करें।
प्रेस वार्ता में केंद्रीय अध्यक्ष कमल रजवार, महासचिव गोविन्द पांडेय, सांस्कृतिक सचिव बबीता साह लोहनी, भारती पांडे, उमा कोठारी, शांति बिष्ट, कमला जोशी, मंजू देवपा, शोभा पांडेय, प्रेमा तिवारी, भगवती जोशी, हिमानी चौधरी और गिरीश चंद्र पांडेय सहित परिषद के अन्य पदाधिकारी मौजूद रहे।

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