
brp_del_th:null;
brp_del_sen:null;
delta:null;
module: photo;hw-remosaic: false;touch: (-1.0, -1.0);sceneMode: 3145728;cct_value: 0;AI_Scene: (-1, -1);aec_lux: 0.0;aec_lux_index: 0;HdrStatus: auto;albedo: ;confidence: ;motionLevel: -1;weatherinfo: null;temperature: 38;
देहरादून। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने उत्तराखंड और गुजरात विधानसभाओं द्वारा पारित समान नागरिक संहिता (UCC) को अस्वीकार करते हुए इसे संवैधानिक रूप से असंगत बताया है। बोर्ड का कहना है कि यह कानून संविधान के भाग-3 में मौलिक अधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है।
UCC को संविधान के भाग-4 के नीति-निर्देशक तत्व अनुच्छेद 44 में रखा गया है, जो बाध्यकारी नहीं है। बोर्ड ने जोर दिया कि डा0 बीआर आंबेडकर ने संविधान सभा में आश्वासन दिया था कि इसे जबरन थोपा नहीं जाएगा और जन-सहमति जरूरी है। गुजरात UCC अनुसूचित जनजातियों को बाहर रखता है, इसलिए इसे वास्तविक ‘यूनिफॉर्म’ नहीं कहा जा सकता।
21वें और 22वें विधि आयोग ने UCC को असमय बताया था, जबकि बोर्ड ने विरोध दर्ज किया। उत्तराखंड-गुजरात में गठित समितियों की रिपोर्टें सार्वजनिक नहीं की गईं, जो पारदर्शिता के विरुद्ध है। बोर्ड इसे औपचारिकता मात्र मानता है।
UCC मुस्लिम पर्सनल लॉ जैसे निकाह, तलाक, विरासत पर हस्तक्षेप करता है, जो अनुच्छेद 25-26 का उल्लंघन है। उत्तराखंड UCC को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। बोर्ड ने मदरसा व्यवस्था में सरकारी नियंत्रण और मस्जिद-मजार ध्वस्तीकरण पर भी विरोध जताया।
बोर्ड ने सांप्रदायिक तत्वों के खिलाफ पुलिस की निष्क्रियता, मुस्लिम नाबालिग अपहरण मामलों में चुप्पी पर सवाल उठाए। पंजाब मॉडल पर कठोर कानून की मांग की। सरकार से सभी नागरिकों के अधिकारों की निष्पक्ष रक्षा की अपील की।
बोर्ड ने UCC क्रियान्वयन रोकने, संवैधानिक समीक्षा और व्यापक परामर्श की मांग की।
इस दौरान डा0 सैयद क़ासिम रसूल इलयास राष्ट्रीय प्रवक्ता, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, एडवोकेट रजिया बेगम आदि मौजूद रहे।






