
नई दिल्ली 06 अप्रैल।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि भारत में हर नए शैक्षणिक सत्र के साथ राष्ट्रीय नवनिर्माण का एक महत्वपूर्ण क्षण सामने आता है। देशभर में लाखों बच्चे नई उम्मीदों और आकांक्षाओं के साथ स्कूलों में प्रवेश लेते हैं, जो राष्ट्र के भविष्य और साझा जिम्मेदारी का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि इस वर्ष लगभग दो करोड़ बच्चों ने पहली कक्षा में प्रवेश लिया है। भारत की शिक्षा व्यवस्था दुनिया की सबसे बड़ी व्यवस्थाओं में से एक है, जिसमें 14.7 लाख से अधिक स्कूल, लगभग 25 करोड़ विद्यार्थी और एक करोड़ से ज्यादा शिक्षक शामिल हैं।प्रधान ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 ने शिक्षा को रटने की पद्धति से आगे बढ़ाकर जिज्ञासा, समझ और समग्र विकास पर केंद्रित किया है। बालवाटिका की व्यवस्था लागू होने से अब छोटे बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा को औपचारिक स्कूल व्यवस्था का हिस्सा बनाया गया है, जिससे बच्चे पहली कक्षा में बेहतर तैयारी के साथ प्रवेश कर रहे हैं।उन्होंने कहा कि स्कूल का पहला दिन बच्चों के लिए उत्साह और जिज्ञासा से भरा होता है। यदि बच्चों को सुरक्षित और सहयोगी वातावरण मिलता है, तो उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और वे सक्रिय रूप से सीखने की प्रक्रिया में भाग लेते हैं। शुरुआती वर्षों में खेल, खोज और अनुभव आधारित शिक्षा बच्चों के जीवनभर के सीखने की मजबूत नींव तैयार करती है।
केंद्रीय मंत्री ने बताया कि बुनियादी साक्षरता और अंकगणित को मजबूत करने के लिए निपुण भारत मिशन चलाया जा रहा है, जिसका लक्ष्य कक्षा दो तक हर बच्चे को समझ के साथ पढ़ने और बुनियादी गणित करने में सक्षम बनाना है। उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल अकादमिक विषयों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि कला, खेल और मूल्यों के माध्यम से ‘संपूर्ण बच्चे’ के विकास पर भी ध्यान देना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि बदलती जीवनशैली और खान-पान की आदतों के कारण बच्चों के स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना जरूरी है। स्कूलों में अनिवार्य शारीरिक शिक्षा, ‘ऑयल बोर्ड’ और ‘शुगर बोर्ड’ जैसे कदम तथा पीएम-पोषण योजना के माध्यम से पोषण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
प्रधान ने कहा कि तकनीक शिक्षा के लिए उपयोगी माध्यम है, लेकिन सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से बढ़ते स्क्रीन टाइम और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताएं भी सामने आ रही हैं। ऐसे में स्कूलों और परिवारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि तकनीक का उपयोग सीखने के साधन के रूप में हो।
उन्होंने कहा कि शिक्षा सुधारों को जमीन पर लागू करने में शिक्षकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। शिक्षक ही नीति और कक्षा के बीच सेतु का काम करते हैं। उन्होंने शिक्षकों से बच्चों की मातृभाषा का सम्मान करते हुए योग्यता आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने का आह्वान किया।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने अभिभावकों से भी बच्चों की शिक्षा में सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की। उन्होंने कहा कि घर ही बच्चे की पहली पाठशाला है और माता-पिता उसके पहले शिक्षक होते हैं। बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करना, उनके प्रश्नों का धैर्यपूर्वक उत्तर देना और उन्हें संतुलित पोषण, पर्याप्त नींद तथा शारीरिक गतिविधिउपलब्ध कराना बेहद जरूरी है।
उन्होंने कहा कि शिक्षा एक साझा राष्ट्रीय जिम्मेदारी है, जिसमें सरकार, स्कूल, शिक्षक, अभिभावक और समाज सभी की भूमिका है। यदि सभी मिलकर प्रयास करें, तो हर कक्षा बच्चों के सपनों को साकार करने का मंच बन सकती है और 2047 तक विकसित भारत के निर्माण में आज के विद्यार्थी अग्रणी भूमिका निभाएंगे।







