भेदभाव मन का विषय, शक्ति और संस्कार से होगा समाज परिवर्तन: मोहन भागवत

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

देहरादून, 22 फरवरी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में “संघ यात्रा – नये क्षितिज, नये आयाम” विषय पर प्रमुख जन गोष्ठी एवं विविध क्षेत्र समन्वित संवाद का आयोजन देहरादून स्थित हिमालयन कल्चरल सेंटर के सभागार में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।
कार्यक्रम का शुभारंभ सरसंघचालक द्वारा भारत माता के चित्र पर पुष्प अर्पण एवं सामूहिक वंदेमातरम् गायन से हुआ। संचालन विभाग प्रचार प्रमुख गजेन्द्र खंडूड़ी ने किया। प्रांत कार्यवाह दिनेश सेमवाल ने शताब्दी वर्ष के अंतर्गत उत्तराखंड में आयोजित पथ संचलन, घोष संचलन, गृह संपर्क अभियान, परिवार संपर्क एवं हिंदू सम्मेलनों की जानकारी देते हुए आगामी योजनाओं का उल्लेख किया।
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कहा कि संघ को बाहरी गतिविधियों से आंकना उसकी वास्तविकता को समझना नहीं है। पथ संचलन देखकर उसे अर्धसैनिक संगठन, गीत सुनकर संगीत मंडली और सेवा कार्य देखकर केवल सेवा संगठन मान लेना अधूरा दृष्टिकोण है। उन्होंने कहा कि संघ व्यक्ति निर्माण का कार्य करता है, क्योंकि सशक्त व्यक्ति से ही सशक्त समाज और राष्ट्र का निर्माण संभव है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं करता। राष्ट्र सशक्त होगा तो नागरिक भी सुरक्षित और सशक्त होंगे।
संघ संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि डॉ. हेडगेवार जन्मजात देशभक्त थे। बाल्यकाल में महारानी विक्टोरिया के जन्मदिवस पर वितरित मिठाई लेने से उन्होंने इंकार किया था। वे अनुशीलन समिति से जुड़े रहे और वंदेमातरम् गान के कारण अंग्रेजों के मुकदमे का सामना भी किया। भारत को पुनः पराधीनता से बचाने के संकल्प के साथ उन्होंने संघ की स्थापना की।
भागवत ने कहा कि लंबी ऐतिहासिक यात्रा के बाद आज विश्व भारत को नेतृत्वकारी भूमिका में देखना चाहता है। उन्होंने संघ के “पंच परिवर्तन” सिद्धांतों के माध्यम से भारत को परम वैभव तक ले जाने का आह्वान किया।
प्रश्नोत्तर सत्र में उन्होंने कहा कि सामाजिक कुरीतियों और भेदभाव का मूल कारण व्यवस्था नहीं, बल्कि मन है। अंधकार को कोसने से नहीं, प्रकाश जलाने से परिवर्तन आता है। व्यवहार में बदलाव से ही सामाजिक समरसता संभव है। डिजिटल युग में तकनीक को साधन बताते हुए उन्होंने संयम और अनुशासन पर बल दिया तथा परिवार में आत्मीयता और संवाद को प्राथमिकता देने की आवश्यकता बताई।
उन्होंने कहा कि जो जोड़ने का कार्य करे वही हिंदू है और मातृभूमि के प्रति भक्ति आवश्यक है। विश्व शक्ति को समझता है, इसलिए शक्ति अर्जित करनी होगी, किंतु उसका उपयोग मर्यादित होना चाहिए। महिलाओं की भूमिका पर उन्होंने कहा कि वे पूर्णतः सक्षम और स्वतंत्र हैं तथा देश संचालन में उनकी भागीदारी 33 प्रतिशत ही नहीं, 50 प्रतिशत तक होनी चाहिए।
उत्तराखंड की नदियों एवं पर्यावरण संरक्षण के लिए समन्वित नीति और स्थानीय सहभागिता पर बल देते हुए उन्होंने शिक्षा में पाठ्यक्रम से अधिक शिक्षकों के संस्कारों को महत्वपूर्ण बताया। आरक्षण, समान नागरिक संहिता एवं वर्गीकरण जैसे विषयों पर समाज में प्रमाणिकता और सद्भाव से कार्य करने की आवश्यकता बताई।उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ हिंदुत्व की राजनीति नहीं, बल्कि व्यक्ति निर्माण के माध्यम से समाज उत्थान का कार्य करता है। भ्रष्टाचार मन से प्रारंभ होता है और वहीं समाप्त किया जा सकता है। जनसंख्या को संसाधन और दायित्व—दोनों रूपों में देखते हुए समान रूप से लागू होने वाली नीति की आवश्यकता पर बल दिया।कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों के प्रबुद्धजन, शिक्षाविद्, उद्योग जगत के प्रतिनिधि एवं बड़ी संख्या में स्वयंसेवक उपस्थित रहे। राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

Leave a Comment

और पढ़ें