पलायन की गंभीर समस्याः बदली परिस्थितियों में लंबा रास्ता तय करना बाकी
नैनीताल 30 जुलाई। उत्तराखंड राज्य को बने हुए 24 साल हो गए, लेकिन इस पहाड़ी राज्य में पलायन एक ऐसा विषय है जिसका अभी तक कोई समाधान नहीं खोजा गया है। भले ही पिछले कुछ सालों में सरकार ने गांव से बढ़ते पलायन को रोकने के लिए कुछ कदम अवश्य उठाए हैं, लेकिन बदली परिस्थितियों में लंबा रास्ता तय करना अभी बाकी है। वर्तमान की पुष्कर सिंह धामी सरकार ने वीरान होते गांव से बढ़ते पलायन को रोकने के लिए कुछ योजनाएं बनाई है लेकिन पिफलहाल उनका कोई असर होता नहीं दिख रहा है। बीते वर्षों तक उत्तराखंड के गांव से निरंतर हो रहे पलायन का कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं था। लंबी प्रतीक्षा के बाद वर्ष 2018 में ग्रामीण विकास एवं पलायन आयोग (अब पलायन निवारण आयोग) अस्तित्व में आया।
गांव छोड़कर शहरों की ओर पलायन का सबसे अधिक असर अल्मोड़ा, टिहरी, पौड़ी और नैनीताल जिलों में देखा गया है। उधमसिंह नगर और देहरादून के गांव से अन्य जिलों की अपेक्षा कम स्थाई पलायन हुआ है। पिछले दिनों लेखक को अपने ससुराल पक्ष के गांव ‘देवनौला’ जो अल्मोड़ा जनपद में लमगड़ा कस्बे से 6 किलोमीटर आगे स्थित है, वहां एक पूजा में जाने का अवसर मिला।
हालांकि प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के अंतर्गत गांव के पास तक सड़क पहुंच गई है, लेकिन इसके बावजूद यहां बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा है। गांव के अधिकांश घर खाली हो चुके हैं। वीरान पड़े यह घर खंडहर में तब्दील हो रहे हैं। कुछ घरों में तो तीन-चार सदस्य ही रह गए हैं, तो कहीं केवल अकेली महिला ही घर में रहकर पहाड़ जैसी जिंदगी से जूझ रही है।
उत्तराखंड के अधिकांश पहाड़ी गांव का यही सच है। गांव के युवा या तो पफौज में भर्ती है या फिर रोजगार की तलाश में हल्द्वानी, देहरादून, लखनऊ, दिल्ली आदि बड़े शहरों की और कूच कर गए हैं। जो गांव छोड़कर शहर को गया वह पिफर शहर का ही होकर रह गया। इस बढ़ते पलायन का ही परिणाम है कि लोगों के पुस्तैनी घर अब भुतहा भवन बन चुके हैं। गांव छोड़कर शहर की ओर गए लोग साल दो साल में कभी कभार ही अपने गांव में आते हैं। अवसर या तो किसी पूजा का होता है या शादी विवाह का। कुछ लोगों ने तो जैसे अपने गांव को भूला ही दिया है। वे सालों से अपने घरों को लौटे ही नहीं है। शहरों की ओर पलायन कर गए लोगों के इन खाली पड़े पुश्तैनी घरों की देखभाल गांव में रह गए उनके पड़ोसी या नाते रिश्तेदार ही करते हैं।
पलायन हो भी क्यों ना। गांव में अब ना खेती-बाड़ी बची है और नहीं रोजगार के कोई साधन है। सरकार के विकास के पहिए शहरों तक ही सीमित होकर रह गए हैं। अधिकांश गांव पानी की समस्या से जूझ रहे हैं। सीढ़ीदार खेतों की पफसले मौसम पर ही निर्भर है, क्योंकि इनकी सिंचाई के लिए आने वाला पानी सूख चुका है। खेतों में अगर थोड़ी बहुत पफसल या सब्जी होती भी है तो वह जंगली जानवरों की भेंट चढ़ जाती है। पहाड़ में भले ही नदी नीचे बहती हो लेकिन नदी के ऊपर के गांव प्यासे हैं। इसीलिए उत्तराखंड में एक कहावत प्रसिद्व है की ‘पहाड़ की जवानी और पहाड़ का पानी’ पहाड़ में नहीं टिकता।
देवनौला में सत्तर वर्षीय जगदीश सनवाल से मुलाकात होती है, जिनका गांव कठौली लगभग एक किलोमीटर आगे पहाड़ की तलहटी पर है। वह बताते हैं कि उनके गांव में ना कभी कोई प्रशासनिक अधिकारी आता है और ना ही चुनाव के दौरान नेता वोट मांगने आते हैं। जब जिम्मेदार लोग गांव की ओर रुख करेंगे ही नहीं तो गांव का विकास कैसे होगा? उनके गांव के पास ही पहाड़ के विकास पुरुष कहे जाने वाले और उत्तर प्रदेश तथा उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रह चुके स्व0 नारायण तिवारी का ससुराल भी है। उनका आरोप है कि तिवारी ने इस क्षेत्र के विकास के लिए कभी कुछ नहीं किया।
यही नहीं गांव के मूल निवासी जो शहरों में जाकर बड़े पदों पर कार्यरत हैं, उन्होंने भी गांव के विकास के बारे में कभी नहीं सोचा, जबकि वह चाहते तो बहुत कुछ कर सकते थे। गांव में रोजगार के स्थाई साधन तो कुछ है नहीं, शिक्षा के हाल भी अच्छे नहीं है। विद्यालय है तो शिक्षकों और संसाधनों की भारी कमी है। किसी विद्यालय में एक शिक्षक है, तो कई विद्यालय छात्रा संख्या कम होने के कारण बंद हो चुके हैं। सरकार ने भले ही हर गांव में प्राइमरी स्कूल खोल दिए हैं, लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए बच्चों को कई किलोमीटर दूर की पैदल यात्रा करनी पड़ती है।
गांव के मूल निवासी और अब लखनऊ में रह रहे नगर निगम पार्षद उमेश सनवाल कहते हैं कि ऐसी परिस्थितियों में पलायन करना लोगों की मजबूरी है। रोजी-रोटी की तलाश में युवा शहरों की ओर रुख करते हैं और फिर उस शहर को ही हमेशा के लिए अपना स्थाई निवास बना लेते हैं। शहरों के बिल्डर और प्रापर्टी डीलर गांव छोड़ चुके इन लोगों की जमीनों को सस्ते दामों में खरीद कर वहां रिसोर्ट, भवन बनाकर बेच रहे हैं। यह एक खतरनाक स्थिति है जो लोगों को अपनी मूल जड़ों से अलग कर रही है। आकाशवाणी लखनऊ में कार्यरत विद्यासागर सनवाल का मानना है कि पलायन रोकने के लिए सरकार को प्रभावी कदम उठाने चाहिए तथा ईमानदारी और गंभीरता के साथ योजनाओं को गांव में लागू करना चाहिए। गांव के विकास कार्यों में गांव के लोगों की भागीदारी सुनिश्चित हो, उन्हें अपनी उपज का अच्छा भुगतान मिले तथा कुटीर उद्योगों को बढ़ावा मिलना चाहिए।
एक रिपोर्ट के मुताबिक 2018 से 2022 तक 3 लाख से अधिक लोग राज्य के विभिन्न हिस्सों से शहरों की ओर पलायन कर गए हैं। 2011 तक उत्तराखंड में 1,034 निर्जन गांव थे और 2011 से 2018 तक इनकी संख्या में 734 की वृ(ि हुई है। वर्ष 2018 से 2022 के मध्य 24 गांव वीरान हुए और राज्य में वीरान गांवों की संख्या 1,792 तक पहुंच गई है। आंकड़ों से पता चलता है कि टिहरी में 9 गांव, चंपावत में 5 ,पौड़ी और पिथौरागढ़ में 3-3 और अल्मोड़ा तथा चमोली में 2-2 गांव ऐसे हैं जिनमें कोई आबादी नहीं है। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि देवभूमि कहलाए जाने वाले उत्तराखंड राज्य में घोस्ट विलेजों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
यह सही है कि इस बढ़ रहे पलायन को एकदम से नहीं थामा जा सकता है, लेकिन इसे रोकने के लिए ठोस रणनीति बनाकर काम करने की आवश्यकता है। असल में गांव से पलायन करना लोगों की विवशता है। यदि गांव में मूलभूत सुविधाओं के साथ शिक्षा, पेयजल, स्वास्थ्य तथा रोजगार पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जाए, तो कोई अपनी जड़ों को छोड़कर क्यों जाएगा। गांवों के विकास और वहां रोजगार-स्वरोजगार के दृष्टिगत एकीकृत कार्ययोजना का खाका तैयार किया जाना चाहिए। विकास की दीर्घकालिक योजनाओं को आगे बढ़ाने की जरूरत है और यह सभी योजनाएं गांव केंद्रित होनी चाहिए।







