वेंडरों को आम आदमी से लूट की छूट देती राज्य सरकार : राकेश बड़थ्वाल

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बीस रूपये का खुलेआम बिक रहा है कचहरी में दस रूपये वाला ई स्टांप पेपर

देहरादून 3 जुलाई ।रोजमर्रा की जिन्दगी में कई सारी औपचारिकताएं आम आदमी को करनी होती है। इसके लिए वह कोर्ट कचहरी से लेकर जाने कहां कहां के चक्कर लगाता रहता है। आज हमें आधारकार्डए राशनकार्डए आयुष्मानकार्ड से लेकर वोटर आईडी आदि बनवाने होते है ताकि अपनी जिन्दगी को सामान्य तरीके से गुजार सके। लेकिन इसके लिए कई किस्म के दस्तावेज बनवाने होते है और इन दस्तावेजों के लिए अमूमन मांगा जाता है शपथपत्र जो बिना स्टांप पेपर के नही बनता है।
जाहिर सी बात है कि मजबूरी आदमी से क्या न कराये। आमतौर पर सामान्य जरूरतों के लिए हमें दस रूपये के स्टांप में शपथपत्र की दरकार रहती है। जिसपर मैटर को टाइप करके नोटरीफाइड करवाया जाता है। सच कहे तो यह आम जीवन की बुनियाद है। हर कागज को बनवाने की शुरूवात इसी से होती है। कई बार तो टहलाने के वास्ते भी शपथपत्र बनवा लिए जाते है। पहले तो यह तीस चालीस रूपये में बन जाता था लेकिन अब डेढ दो सौ से कम का यह नही बनता है। ऐसा हो भी क्यों न क्योंकि सरकार खुद जनता को लूटवाने को आमादा है।
काफी समय से ई स्टांप पेपर कचहरी में उपलब्ध है और तब से ही यह पेपर दस रूपये का बीस में मिलता है। यह इसलिए कि सरकार ने बकायदा वेंडरों को छूट दे रखी है कि वे प्रत्येक स्टांप पेपर के लिए दस रूपये चार्ज कर सकते है। चाहे वह दस वाला स्टांप हो या पिफर हजार रूपये वाला। इससे सबसे बड़ी मार दस वाले स्टांप पर पड़ी है। वहीं इस लूट की वजह से स्टांप पेपर में शपथपत्रा बनवाना भी महंगा हो गया है। कहां तो सरकार पर महंगाई पर नियंत्राण की जिम्मेदारी होती है। वही वेंडरों को खुली छूट दे रही है कि लूट लो! यह आरोप नही है बल्कि कागजी तथ्य चींख.चींख कर इसकी गवाही दे रहें है।
इसके अलावा एक बड़ी होशियारी भी हो गई है कि पहले जो मैन्यूअली स्टांप पेपर मिला करते थेए उनमें नोटरी के साथ साथ टाइपिंग भी हो जाती थी लेकिन अब अलग से टाइप किया पेपर अटैच करना होता है। इसका मतलब यह कि एक अतिरिक्त कागज पर नोटरी की मुहर लगेगी और हस्ताक्षर होंगे तो जाहिर तौर पर दस रूपये का नोटरी फीस तीस रूपये का हो गया। वहीं एक अतिरिक्त पेज का खर्चा अलग से हो गया।
इससे पहले भी कचहरी में स्टांप पेपर मिला करते थे। उनका प्रिंट भी बेहतरीन होता था लेकिन वह जितने का होताए उसी मूल्य पर बेचा जाता था लेकिन जब से ई स्टांप पेपर आया हैए जनता का शपथपत्र बनवाना मुहाल हो गया है। वेंडरों से इसकी खरीद से लेकर इसको नोटरीफाइड करवाने तक के शुल्क में बढ़ोतरी कर दी गई है। जबकि यह आम आदमी के साथ अन्याय पूर्ण है। आम आदमी के मन में सवाल है कि वह दस रूपये के स्टांप के लिए बीस रूपये क्यों देघ् या फिर वह इस स्टांप को बीस रूपये मूल्य घोषित कर दे ताकि मलाल न रहे कि दस का स्टांप बीस में लिया।
सरकार कैसे वेंडरों को सौ फीसदी से भी ज्यादा का मुनाफा लेने का फरमान सुना सकती है। जबकि वह स्वयं भी दस रूपये के स्टांप बेचे जाने पर 85 पैसे का कमीशन वेंडरों को देती है। एक और बात तो अहम है जो इस पूरे मामले में गड़बड़ी की आशंका पैदा करती है। जब आईटी एक्ट के तहत सूचना का अधिकार में पूछा गया कि ई स्टांप रिलीज के बाद से कितने ई स्टांप सरकार ने बेचे तो उसका जवाब नही मिला जबकि आनलाइन बेचे गए सामान की मात्रा बताने में तो आसानी होनी चाहिये। अब इस आंकड़े को छिपा कर किसका बचाव हो रहा हैए सोचने वाली बात है। ऐसे में भ्रष्टाचार की बू तो आयेगी ही।
जब जिम्मेदारों से पूछा गया कि ई.स्टाम्प पेपर में वेन्डरों को 100 प्रतिशत का मुनाफा किस नियमावली के तहत उत्तराखण्ड सरकार द्वारा दिया जाता है तो जवाब नही मिला। न ही उन वेंडरों की सूची सरकार के पास है जिससे पता चले कि कितने वेंडर हैए जो सरकार की इस ई स्टांप में लूट की छूट का फायदा उठा रहे है।

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