
देहरादून, 26 सितंबर। विश्व फेफड़ा दिवस के अवसर पर आयोजित गोष्ठी में फेफड़ों की सेहत और सांस संबंधी बीमारियों को लेकर जागरूकता पर चर्चा हुई। गोष्ठी को संबोधित करते हुए डॉ. अनिल कुमार दीक्षित ने कहा कि फेफड़े शरीर का ऐसा अंग हैं, जो दिन-रात बिना रुके काम करते हैं, लेकिन लोग अक्सर इनकी सेहत को तब तक नजरअंदाज करते रहते हैं, जब तक सांस लेने में परेशानी शुरू नहीं हो जाती।
उन्होंने कहा कि सिगरेट और बीड़ी के धुएं के अलावा वाहनों का प्रदूषण, निर्माण स्थलों की धूल, घर के भीतर का धुआं और लंबे समय तक प्रदूषित वातावरण में रहना फेफड़ों की सेहत को प्रभावित कर सकता है। धूम्रपान करने वाले व्यक्ति के साथ उसके आसपास रहने वाले लोगों को भी दूसरे के धुएं के संपर्क से नुकसान हो सकता है। इसलिए घर, वाहन और बंद स्थानों में धूम्रपान से बचना जरूरी है।
डॉ. दीक्षित ने बताया कि फेफड़ों की परेशानी हमेशा अचानक सामने नहीं आती। लगातार खांसी, बार-बार सांस फूलना, सीने में जकड़न, सांस लेते समय घरघराहट और सामान्य काम करने पर पहले की अपेक्षा जल्दी थकान जैसे संकेतों पर ध्यान देना चाहिए। हालांकि हर खांसी या सांस फूलना गंभीर बीमारी का संकेत नहीं होता, लेकिन यदि समस्या लंबे समय तक बनी रहे, बार-बार हो या बढ़ती जाए तो चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।
उन्होंने बच्चों के फेफड़ों की सेहत पर भी विशेष ध्यान देने की बात कही। बच्चों को सिगरेट के धुएं से दूर रखने, घर के भीतर धुआं जमा न होने देने और अनावश्यक प्रदूषण से बचाने की सलाह दी गई। बच्चों में लगातार खांसी, सांस लेने में परेशानी या बार-बार होने वाली श्वसन संबंधी समस्या को नजरअंदाज नहीं करने की बात कही गई।
गोष्ठी में डॉ. दीक्षित ने फेफड़ों की क्षमता के सामान्य अंदाजे के लिए गुब्बारे से जुड़े एक सरल परीक्षण की जानकारी भी दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह चिकित्सकीय जांच का विकल्प नहीं है। यदि सांस लेने में लगातार परेशानी हो या गुब्बारा फुलाने जैसे सामान्य प्रयास में भी दिक्कत महसूस हो तो विशेषज्ञ चिकित्सक से जांच कराने की सलाह दी गई।
उन्होंने कहा कि फेफड़ों को स्वस्थ रखने के लिए तंबाकू से दूरी, धूल-धुएं से बचाव, कार्यस्थल पर सुरक्षा उपकरणों का इस्तेमाल, घर में पर्याप्त हवा का आवागमन और नियमित शारीरिक गतिविधि जरूरी है। प्रदूषण अधिक होने पर अनावश्यक रूप से लंबे समय तक बाहर रहने से भी बचना चाहिए।
डॉ. दीक्षित ने कहा कि फेफड़ों की देखभाल किसी एक दिन या किसी एक उम्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरी जिंदगी की जिम्मेदारी है। शरीर में सांस चल रही है, इसका मतलब यह नहीं कि फेफड़े पूरी तरह स्वस्थ हैं। लगातार बने रहने वाले लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय समय पर चिकित्सकीय सलाह लेना ही बेहतर है।







