देहरादून 24 जून।उत्तराखंड की लोकभाषाओं पर केंद्रित चर्चित ऑनलाइन कार्यक्रम “म्योर पहाड़, मेरि पछ्यांण” ने पांच साल पूरे कर लिए हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से उत्तराखंड की क्षेत्रीय भाषाओं को मुख्य धारा में लाने के अनूठे प्रयास को हर तरफ से सराहना मिल रही है। विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर गढ़वाली, कुमाउनी, जौनसारी, बंगाणी, नेपाली सहित अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ में लगभग 350 वार्ताएं सफलतापूर्वक प्रसारित हो चुकी हैं।
कार्यक्रम के संस्थापक हेम पंत ने बताया कि कोरोना की पहली लहर के दौरान जून 2020 में शुरू किए गए ऑनलाइन कुमाउनी साक्षात्कार “म्योर पहाड़, मेरि पछ्यांण” श्रृंखला के अंतर्गत अब हर सप्ताह शनिवार शाम 7 बजे साक्षात्कार आयोजित किए जा रहे हैं। मेहमान के रूप में लेखक, चिकित्सक, कलाकार, समाज सेवा, वैज्ञानिक, पत्रकार, खिलाड़ी, राजनीति और अन्य क्षेत्रों में नाम कमा चुके चर्चित व्यक्तित्व अपनी प्रेरणादायक जीवनयात्रा बताते हैं। साक्षात्कारकर्ता के रूप में वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार और युवा सामाजिक कार्यकर्ता होते है। पूरे विश्व में रहने वाले उत्तराखंड के प्रवासियों के बीच यह वार्तालाप श्रृंखला बहुत प्रसिद्ध है।
यह वार्ता कुमाउनी साक्षात्कार के साथ शुरू की गई थी। पिछले पांच साल से अनवरत चल रहे कार्यक्रम के दौरान 281 कुमाउनी साक्षात्कार प्रसारित हॉ चुके हैं। अब तक प्रसारित सभी लाइव कार्यक्रमों को 1 करोड़ से अधिक बार देखा जा चुका है। इस कार्यक्रम को फेसबुक और यूट्यूब पर लगातार संचालित करने में “क्रिएटिव उत्तराखंड संस्था” से जुड़े हल्द्वानी निवासी हिमांशु पाठक, दयाल पांडे सहित लगभग 80 लोगों की टीम है, जिनकी सक्रिय भागीदारी से कार्यक्रम अपनी एक खास पहचान बना चुका है।
व्यक्तिगत साक्षात्कार के अलावा “म्योर पहाड़, मेरि पछ्यांण” श्रृंखला के अंतर्गत दिवंगत विभूतियों के योगदान और जीवनयात्रा पर “हमार पुरुख” नाम से भी कुमाउनी पैनल चर्चा के 22 अंक आयोजित हो चुके हैं। “हमार पुरुख” के अंतर्गत अब तक पं. नैन सिंह रावत, मोहन उप्रेती, डॉ. डीडी पन्त, शैलेश मटियानी, मोहन उप्रेती, प्रो. के. एस. वल्दिया, गौरा पन्त “शिवानी”, शेर दा अनपढ़, डॉ. हेम चन्द्र जोशी, चंद्रशेखर लोहुमी, हीरा सिंह राणा, बंशीधर पाठक ‘जिज्ञासु’, मथुरा दत्त मठपाल, चारु चंद्र पांडे आदि के रचनात्मक योगदान पर कुमाउनी वार्ता हो चुकी है। साथ ही “ज्यौला मुरुलि – बोलियों की जुगलबंदी” नाम से एक और वार्तालाप श्रृंखला शुरू की गई। शुरुआत में कुमाउनी – गढ़वाली बातचीत के दो अंकों में वरिष्ठ पत्रकार राजीव लोचन साह ने लोकगायक-कवि नरेंद्र सिंह नेगी का साक्षात्कार लिया। उत्तराखंड की क्षेत्रीय बोलियों को आगे बढ़ाने के इस अनूठे सामूहिक प्रयास को दर्शकों की काफी सराहना मिली। अब तक इस कार्यक्रम के 20 अंकों में कुमाउनी के साथ गढ़वाली, जौनसारी, उर्दू, बंगाणी, नेपाली आदि भाषाओं के साथ मिश्रित बातचीत को सफलता पूर्वक प्रसारण किया जा चुका है।ऑनलाइन बातचीत की इन श्रृंखलाओं ने खासतौर पर युवा पीढ़ी को अपनी क्षेत्रीय बोलियों की ओर आकर्षित किया है। निरंतरता के साथ आयोजित किए जा रहे कार्यक्रमों के कारण प्रवासियों और उत्तराखंड में रहने वाले लोगों के बीच अपनी भाषा को बचा पाने की उम्मीद जगी है। अपनी मातृभूमि से दूर रह रहे लोगों को जड़ों से जोड़कर रखने में भी यह कार्यक्रम सफल हो रहा है। इस कार्यक्रम के अतिथि और दर्शकों में कनाडा, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, खाड़ी देश और अफ्रीका महाद्वीप सहित पूरे विश्वभर में फैले उत्तराखंड मूल के लोग शामिल रहते हैं। यह प्रवासी उत्तराखंडी कार्यक्रम के माध्यम से अपनी मातृभूमि के विकास में योगदान देने की यथासंभव कोशिश भी कर रहे हैं। तकनीक के उपयोग से उत्तराखंड की भाषा – संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाने की यह कोशिश अब सफल होती दिख रही है। इस सीरीज के अंतर्गत जिन लोगों का साक्षात्कार आयोजित किया जा चुका है, उनमें कुछ प्रमुख नाम मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, स्व. प्रहलाद मेहरा, लवराज धर्मशक्तू, भूपेश जोशी, मृणाल पांडे, नरेंद्र सिंह नेगी, अनूप साह, हरीश रावत, देवेन मेवाड़ी, पुष्पेश पन्त, राधा बहन, इरा पांडे, जस्टिस प्रफुल्ल पंत, शेखर पाठक, नैन नाथ रावल, पंकज बिष्ट, काशी सिंह ऐरी, शिकारी लखपत सिंह रावत, भगत सिंह कोश्यारी, राधा रतूड़ी – अनिल रतूड़ी, यशोधर मठपाल, रमेश चन्द्र शाह, स्व. शेखर जोशी, बसन्ती बिष्ट, डॉ. माधुरी बड़थ्वाल, डॉ. जीवन सिंह तितियाल, प्रो. गोविन्द सिंह, रमेश भट्ट, अनूप साह, युगल जोशी, गोविंद पन्त ‘राजू’, अजय टम्टा, अजय भट्ट, हेमन्त पांडे, आरजे काव्य, पवन पहाड़ी, बिशन सिंह चुफाल आदि हैं
।








