निजी विश्वविद्यालयों की स्थाई विन्यास निधि समाप्त करने के फैसले का स्वागत, कॉलेजों की सुरक्षा राशि भी खत्म करने की मांग
देहरादून 23 अक्टूबर ।निजी कॉलेज एसोसिएशन उत्तराखंड के अध्यक्ष डॉ. सुनील अग्रवाल ने निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना के लिए राज्य सरकार के पक्ष में जमा की जाने वाली पांच करोड़ रुपये की स्थाई विन्यास निधि समाप्त करने के कैबिनेट के फैसले का स्वागत किया है। हालांकि उन्होंने सवाल उठाया कि जब विश्वविद्यालय खोलने के लिए यह बाध्यता समाप्त की जा रही है तो प्रदेश में वर्षों से संचालित निजी कॉलेजों के लिए सुरक्षा राशि की बाध्यता क्यों बरकरार रखी गई है।
डॉ. अग्रवाल ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था में प्रदेश में विश्वविद्यालय खोलना आसान हो गया है, जबकि पिछले 25 वर्षों से संचालित कॉलेजों को चलाना मुश्किल हो रहा है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2016 के नियमों के तहत निजी कॉलेजों में संचालित परंपरागत पाठ्यक्रम के लिए प्रति पाठ्यक्रम 15 लाख रुपये और व्यावसायिक पाठ्यक्रम के लिए प्रति पाठ्यक्रम 35 लाख रुपये की सुरक्षा राशि संबंधित विश्वविद्यालय में जमा करना अनिवार्य किया गया है। यह नियम वर्ष 2016 से पहले स्थापित कॉलेजों पर भी लागू किया गया है।
उन्होंने कहा कि सुरक्षा राशि की बाध्यता के कारण कई कॉलेजों को संबद्धता विस्तार के पत्र नहीं मिल पा रहे हैं। कुछ कॉलेजों ने इस नियम के खिलाफ न्यायालय का रुख किया, जहां उन्हें स्थगन आदेश भी मिला, लेकिन विश्वविद्यालय, शासन अथवा राजभवन स्तर से इस मामले में अब तक कोई सकारात्मक पहल नहीं हुई।
डॉ. अग्रवाल ने कहा कि निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना के लिए स्थाई विन्यास निधि की बाध्यता समाप्त करने का सरकार का निर्णय स्वागत योग्य है, लेकिन इससे यह सवाल भी खड़ा होता है कि क्या सरकार चाहती है कि निजी कॉलेज स्वयं को विश्वविद्यालय में परिवर्तित करें और जो ऐसा नहीं कर सकते, वे बंद हो जाएं।
उन्होंने मांग की कि जिस तरह निजी विश्वविद्यालयों के लिए स्थाई विन्यास निधि की बाध्यता समाप्त की गई है, उसी तरह निजी कॉलेजों के लिए भी सुरक्षा राशि जमा करने की अनिवार्यता खत्म की जानी चाहिए। एक ही प्रदेश में विश्वविद्यालय और कॉलेजों के लिए अलग-अलग नियम कल्याणकारी राज्य की भावना के अनुरूप नहीं हैं।
डॉ. सुनील अग्रवाल ने कहा कि इस संबंध में शीघ्र ही मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपकर कॉलेजों की सुरक्षा राशि समाप्त करने की मांग की जाएगी, ताकि छोटे और वर्षों से संचालित निजी कॉलेजों के हितों की भी रक्षा हो सके।








