
देहरादून 13 सितंबर ।श्री दिगंबर जैन पंचायती मंदिर गांधी रोड में परम पूज्य आर्यिका रत्न 105 श्री पूर्णमति माताजी के मंगल सान्निध्य में जैन समाज एवं जैन मिलन परिवार की 20 शाखाओं की ओर से भव्य आचार्य श्री पूजन का आयोजन श्रद्धापूर्वक किया गया। इससे पहले प्रातः श्रीजी का अभिषेक एवं शांतिधारा की गई। कार्यक्रम में जैन मिलन परिवार के राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय पदाधिकारियों सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया।
धर्मसभा का शुभारंभ णमोकार महामंत्र के शुद्ध उच्चारण के साथ हुआ। विद्या समय पूर्ण वर्षायोग समिति एवं सकल दिगंबर जैन समाज देहरादून के सैकड़ों श्रद्धालुओं ने गुरु मां का आशीर्वाद प्राप्त कर धर्मलाभ लिया।
मंगल प्रवचन में आर्यिका रत्न 105 श्री पूर्णमति माताजी ने कहा कि मनुष्य जन्म और जैन कुल की प्राप्ति अत्यंत दुर्लभ है। इसका सदुपयोग आत्मकल्याण के लिए किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि समय निरंतर बीत रहा है और प्रत्येक क्षण भूतकाल बनता जा रहा है। ऐसे में प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं से यह प्रश्न करना चाहिए कि उसके जीवन और परिणामों में कितना परिवर्तन आया है।
उन्होंने कहा कि शरीर नश्वर है, जबकि आत्मा अनंत गुणों से युक्त है। इसलिए शरीर को अपना मानने के भ्रम से निकलकर शुद्ध आत्मस्वरूप को पहचानने का पुरुषार्थ करना चाहिए। ‘मैं आत्मा हूं’ के संस्कार को निरंतर दृढ़ करने और बाहरी पदार्थों के आकर्षण से अपने परिणामों को बचाने की आवश्यकता है।
माताजी ने कहा कि जब व्यक्ति स्वयं को समझता है तो ऐसा अपूर्व आनंद उत्पन्न होता है, जो शब्दों से परे है। विचारों की भीड़ आत्मा से मिलने में बाधक बनती है। इसलिए अपने शुद्ध स्वरूप में रमण करना ही जीवन का वास्तविक प्रयोजन है। उन्होंने कहा कि देह छूटने से पहले देह-दृष्टि छोड़ देना ही वास्तविक साधना है। शरीर और पर-पदार्थों को अपना मानने की दृष्टि से मुक्त होकर आत्मदृष्टि अपनाना ही जन्म-मरण से मुक्ति की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
उन्होंने कहा कि पुण्य और पाप दोनों बंधन के कारण हैं। साधक को अंततः दोनों से ऊपर उठकर शुद्ध आत्मस्वरूप की अनुभूति करनी है। भोगों की चाहत सुख को नष्ट कर तृष्णा को बढ़ाती है। इसलिए बाहरी भोगों के पीछे भागने के बजाय आत्मनिधि को पहचानने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि पर की रुचि में नुकसान और आत्मा की रुचि में मुक्ति है। अपशब्द या विपरीत परिस्थितियों में भी नकारात्मक भाव उत्पन्न होने पर उसे समाप्त करने का प्रयास करना चाहिए।
माताजी ने कहा कि जीवन बहुत छोटा है और इसे आत्मकल्याण व आत्मचिंतन में लगाकर सार्थक बनाना चाहिए। अनंत जन्मों में अनेक संबंध बने, लेकिन अब आवश्यकता अपने परमात्म स्वरूप को पहचानने की है। आत्मा सदा से आत्मा थी, है और रहेगी; भ्रम केवल उसे शरीर मान लेने का है।
मीडिया समन्वयक मधु जैन ने बताया कि मंगलवार से प्रारंभ होने वाले पावन पर्युषण पर्व की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। आत्मबोध संस्कार शिविर में विभिन्न प्रदेशों और नगरों से करीब 600 गुरु भक्त शामिल होंगे। दशलक्षण पर्व के माध्यम से आत्मचिंतन, संयम और संस्कारों को जीवन में उतारने का प्रयास किया जाएगा।
उन्होंने बताया कि प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु गुरु मां के दर्शन और आशीर्वाद के लिए मंदिर पहुंच रहे हैं। मंदिर परिसर में सामायिक, पाठशाला, महाआरती और शंका-समाधान सहित विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित किए जा रहे हैं।







