
देहरादून, 04 मई। उत्तराखण्ड के मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने सोमवार को सचिवालय में आपदा प्रबंधन से जुड़ी महत्वपूर्ण परियोजनाओं की समीक्षा करते हुए ग्लेशियर झीलों की प्रभावी निगरानी को अत्यंत जरूरी बताया। उन्होंने संबंधित संस्थानों को निर्देश दिए कि अत्याधुनिक उपकरणों की स्थापना का कार्य शीघ्र शुरू किया जाए, ताकि संभावित खतरों से समय रहते निपटा जा सके।
बैठक में ग्लेशियर झील विस्फोट जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम की समीक्षा के दौरान बताया गया कि वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी द्वारा वसुंधरा झील को पायलट साइट के रूप में विकसित किया जा रहा है। यहां अर्ली वार्निंग सिस्टम और रियल-टाइम मॉनिटरिंग तंत्र स्थापित किए जाएंगे। मुख्य सचिव ने संस्थान को 2026-27 और 2027-28 की विस्तृत कार्ययोजना व टाइमलाइन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए, साथ ही झीलों के जलस्तर नियंत्रण और संरचनात्मक उपायों पर भी जोर दिया।
दूसरी बैठक में भूकम्प पूर्व चेतावनी प्रणाली (EEWS) की प्रगति का आकलन किया गया। जानकारी दी गई कि राज्य में अब तक 169 सेंसर और 112 सायरन स्थापित किए जा चुके हैं। आईआईटी रुड़की के सहयोग से इस प्रणाली को और सुदृढ़ किया जा रहा है। 26 फरवरी 2026 को हुए एमओयू के तहत पूरे वर्ष 2026 में अलर्ट प्रसारण, संचालन और अनुरक्षण का कार्य किया जा रहा है।
राष्ट्रीय भूकम्प जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के तहत 500 स्ट्रॉन्ग मोशन सेंसर लगाए जा रहे हैं, जबकि चेतावनी तंत्र को मजबूत करने के लिए 526 अतिरिक्त सायरन स्थापित करने की योजना है। साथ ही राज्य में 8 मौजूदा वेधशालाओं के अलावा रुड़की, देवप्रयाग, कर्णप्रयाग, रामनगर, बागेश्वर, अल्मोड़ा, केदारनाथ और चकराता में नई वेधशालाएं स्थापित करने का प्रस्ताव भी रखा गया है।
मुख्य सचिव ने निर्देश दिए कि चेतावनी प्रणाली को और अधिक सटीक, त्वरित और आमजन तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने योग्य बनाया जाए।
तीसरी बैठक में डिब्रिस फ्लो (मलबा बहाव) के जोखिम आकलन पर चर्चा हुई। चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ जिलों में 48 संवेदनशील स्थलों की पहचान की गई है, जिन्हें जोखिम के आधार पर वर्गीकृत किया गया है।
इस कार्य के लिए विभिन्न संस्थानों—उत्तराखण्ड भूस्खलन न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र, केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान और उत्तराखण्ड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र—को शामिल करते हुए संयुक्त समिति गठित की गई है।मुख्य सचिव ने निर्देश दिए कि चिन्हित क्षेत्रों में प्राथमिकता के आधार पर सर्वेक्षण, निगरानी और निवारक कार्य किए जाएं तथा जिला प्रशासन और तकनीकी संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित किया जाए।बैठक में विभिन्न वैज्ञानिकों और अधिकारियों ने ऑफलाइन व ऑनलाइन माध्यम से प्रतिभाग किया।








